मुकुट टुटा मुर्ति टूटी भावना फिर भी नहीं न टूटी गांव छुटा गली छुटी स्नेह की थाली न छुटी फुल झर भू चूम लेता सुरभि सांसे बिखर जाती है। लता जी की सांसे।
लताजी का महाप्रयाण कोकिल कंठ का महाप्रयाण कैसे कहें ? बस भौतिक देह स्वर देह में शाश्वत रूप से परिणत हो गई है।वसंत में कोयल उड़ी लेकिन उन स्वरों को सौंपकर जिनसे हम अपने जीवन की लय रचते आए।उनके स्वरों के बिना हम अपने जीवन राग को कैसे सुनें?उनके स्वरContinue Reading







